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Rahul Kumar

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सिर्फ फरार घोषित होने के आधार पर सम्पति का कुर्की करना गलत है।

Posted On: 20 Dec, 2015 Others में

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सिर्फ फरार घोषित होने के आधार पर सम्पति का कुर्की करना गलत है।कुछ प्रावधान सिर्फ किताब भर ही सीमित रहती है और कानूनी कार्रवाई कानूनी प्रावधान के बजाय कानूनी परम्परा के अनुसार चलती है।कुर्की उस अवस्था में ही किया जाना चाहिए जब अभियुक्त का अन्यथा पकड़ में आने की कोई संभावना ना हो।यदि अभियुक्त या उनका रिश्तेदार अभियुक्त के पक्ष में साक्ष्य को पुलिस के समक्ष पेश कर रहा हो तो कुर्की का आदेश पारित करने/करवाने से पहले उसके साक्ष्य को देखा जाना चाहिए।
एक ऐसे मामले में मेरे द्वारा दी गयी मंतव्य नीचे देखे-
”CrPC का धारा 83(1) के तहत फरार घोषित करने के बाद कोर्ट को कुर्की का आदेश देने से पहले कारण को लिखित में दर्ज करना चाहिए।सिर्फ फरार घोषित होने के आधार पर कुर्की का आदेश नहीं दिया जा सकता।IO(जाँच अधिकारी) को आदेश लेने के लिए ऐसा कारण कोर्ट को बताना चाहिए।आपके द्वारा सारे सबूत दिए जाने के बावजूद(जिसके आधार पर बाद में क्राइम ब्रांच ने आपको निर्दोष बताया) IO कोर्ट में कुर्की का आदेश लेने पहुँच गए जो गलत था।चूँकि कोर्ट ने कारण जाने और दर्ज किये बगैर सिर्फ फरार होने के आधार पर कुर्की का आदेश दे दिया इसलिए कोर्ट दोषी है।चूँकि IO ने आपके साक्ष्य के बारे में बताये बगैर कोर्ट से कुर्की का आदेश जारी करवा लिया इसलिए IO भी दोषी है।कोर्ट का सम्बंधित मजिस्ट्रेट और IO धारा 166,166A(b),167 और 218 IPC के तहत दोषी है।साथ में मजिस्ट्रेट धारा 219 IPC के तहत भी दोषी है।IPC के इन धाराओं के तहत कार्रवाई हेतु प्रकिया CrPC में मौजूद नहीं है।धारा 340 r/w धारा 195 CrPC में जिस तरह की प्रकिया कोर्ट और लोकसेवक के समक्ष की जाने वाली अपराधों के लिए दी गयी है, उसी तरह की प्रकिया लोकसेवक और कोर्ट द्वारा की जाने वाली अपराधो के लिए भी होना चाहिए।ऐसी अवस्था में हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करके ही इन धारों के तहत हुई किसी अपराध को चुनौती दिया जा सकता है जो एकमात्र विकल्प है।कुर्की का गलत आदेश पारित करना/करवाना भी ऐसा ही एक अपराध है।Writ of mandamus के तहत हाइकोर्ट कार्रवाई कर सकती है।”

………………………….

ON TODAY’S RELEASE OF SO CALLED JUVENILE
नाबालिगी का उम्र और आपसी सहमति से सेक्स का उम्र घटाकर 16 साल कर ही देना चाहिए।ज्योति सिंह पाण्डेय(निर्भया) के केस का वो तथाकथित नाबालिग लड़का 18 साल से ज्यादा का ही रहा होगा,भले ही कागज पर 18 साल से कम हो।जब मालूम है कि 18 साल के ज्यादातर बच्चे भी प्रमाणपत्र पर 16 साल या इससे कम के ही रहते हैं तो उम्र घटा कर 16 साल कर देने के बावजूद भी तो वास्तव में वो 18 साल या इससे ज्यादा का ही रहते हैं।16 साल कर देने से वास्तव में बालिग हो चुके तथाकथित नाबालिग(अभी के अनुसार) को ज्यादा सजा भी मिलेगी और प्रेम-सम्बन्ध जैसे मामले में अपहरण और रेप में फंसने वाले निर्दोष को बचाया भी जा सकेगा।भागने वाली ज्यादातर नाबालिग लड़की और प्रेम-प्रसंग में शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाली ज्यादार नाबालिग लड़की 16-18 साल के बीच की होती है और ज्यादातर मामले में 2 साल ज्यादा की होती ही होगी।पुलिस और कोर्ट पर बोझ का एक बड़ा भाग इन मुकदमों का रहता है लेकिन ये मुकदमा बकवास और Abuse of the process of law के सिवाय कुछ नहीं है।
नाबालिगी के आधार पर कानून का दुरूपयोग करने का स्थिति ये है कि जिन लड़कियों के पास पढ़ी-लिखी नहीं होने के कारण जन्म का कोई स्कूली प्रमाण या जन्म प्रमाणपत्र नहीं होता है तो ज्यादातर मामले में इन लड़कियों के अभिभावको द्वारा लड़कियों का आपसी सहमति से भागने और सेक्स करने पर भी नाबालिग बताकर अपहरण और रेप का झूठा मुकदमा फंसाने के लिए दायर किया जाता है भले ही लड़कियां बालिग हो और 18 साल से ज्यादा की हो।झूठा फंसाने के लिए 19 साल की लड़की को 16-17 साल का बताना आसान है लेकिन 16 साल से कम बताना आसान नहीं होगा।



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